सीएमओ ऑफिस का बड़ा खेल, बगैर फायर एनओसी के जारी किए नर्सिंग होम के लाइसेंस-video

यूं तो मनुष्य की जान की कीमत कोई लगा नहीं सकता। लेकिन हादसे के शिकार हो जाने के बाद उनकी जान की कीमत मुआवजे के रूप में जरूर लगा दी जाती है। जी हां हम बात कर रहे हैं जिले रजिस्टर 113 अस्पताल में सिर्फ महज 3 अस्पतालों को ही जिले के फायर बिभाग ने एनओसी सी जिससे यह सिद्ध है की जिले में अस्पतालों को कैसे मानक ताख पर रख लाइसेंस जारी कर दिया जाता है ।फर्रुखाबाद शहर में बड़े पैमाने पर बिना मानकों का ख्याल रखकर निजी अस्पतालों को बना दिया गया । जहां डाॅक्टर अपने निजी स्वार्थ के लिए मरीजों की जान की परवाह किए बिना इलाज के नाम पर भारी भरकम रकम वसूल कर अपने कारोबार को चमका रहे हैं। तो वहीं झोलाछाप डाॅक्टर की लापरवाही से किसी मरीज की जान जाने पर जिम्मेदार अफसर कार्रवाई की बात कर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं।

यूपी का फर्रुखाबाद जनपद विकास और विस्तार के नाम पर तो अछूता नजर आता ही है। साथ ही यहां सुरक्षा मानकों की अनदेखी कर अवैध निजी अस्पतालों का संचालन किया जा रहा है।यहां मसेनी, आवास-विकास, लकूलाबाग जैसे कई इलाकों में बड़ी से लेकर छोटी-छोटी इमारतों में कई निजी अस्पताल चल रहे हैं। यहां एक लाइन से अस्पतालों की मंडी सजी नजर आती है। जहां इनके संचालन में बेतरतीब सुरक्षा मानकों का पालन नहीं हो रहा है।जो कानून व्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है। इतना ही नहीं अधिकांश अस्पताल बिना अग्शिमन सुरक्षा उपकरण, अपातकालीन बाहर निकलने का रास्ता, सही इलाज समेत अन्य कमियां होने के बावजूद पनप रहे हैं। जो कि चिंताजनक है। यहां पर डाॅक्टर इलाज के नाम पर मरीजों की जेब से भारी भरकम रकम वसूलने में जुटे हुए हैं।इससे बच्चों से लेकर बुजुर्ग मरीजों की जान भी खतरे में पड़ जाती है।कई बार इन झोलाछाप डाॅक्टरों की लापरवाही से प्रसूता समेत अनेकों लोगों की जान जा चुकी है।जिसके बाद परिजन अस्पताल परिसर में हंगामा कर दोषी के खिलाफ कार्रवाई की मांग करते रहे हैं। लेकिन मौके पर पुलिस अधिकारी मुआवजे या फिर कार्रवाई का आश्वासन देकर मामला शांत करा देते है। इसके बाद पूरी कार्रवाई ठंडे बस्ते में डाल दी जाती है।

जिले में 113 रजिस्टर्ड अस्पताल- बता दें कि जनपद में 113 अस्पतालों का रजिस्टेशन कराया गया है। लेकिन इसके उलट लगभग 250 से अधिक अवैध ढंग से निजी अस्पतालों का संचालन किया जा रहा है।जहां आने वाले मरीजों की जान से खुलेआम खिलवाड़ किया जाता है।
कार्रवाई के दौरान यह तय है मानक- स्वास्थ्य के नाम पर केंद्र सरकार से लेकर प्रदेश सरकार करोड़ों रुपये का बजट देती है। लेकिन उत्तर प्रदेश में शिक्षा, प्रदूषण कंटोल बोर्ड में रजिस्टेशन और फायर की एनओसी ही मान्य होती है। अस्पतालों में छापेमारी के दौरान इन तीन मानकों को ही ध्यान में रखा जाता है। यह बात डिप्टी सीएमओ डाॅ।राजीव कुमार ने बताई।



मरीज की मौत के बाद अस्पताल में होता बवाल- निजी अस्पतालों में झोलाछाप डाॅक्टर की लापरवाही से जब मरीजों की मौत हो जाती है तो परिजन अस्पताल परिसर में जमकर तोड़फोड़ करते हैं। इतना ही नहीं कई मामलों में तो सड़क जामकर प्रदर्शन किया जाता है। ऐसे में आम राहगीरों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। जिन डाॅक्टरों के नाम पर खोला अस्पताल वह होगे गायब- बता दें कि जनपद में कई ऐसे अस्पताल भी संचालित हैं।जहां नामचीन डाॅक्टरों के नाम पर रजिस्टेशन तो करा दिया गया हैं।लेकिन वह इन अस्पतालों में नहीं आते हैं। बल्कि कुछ तो ऐसे डाॅक्टर भी हैं। जो कि अब अन्य जिलों में चले गए है बही जिले के फायर बिभाग के मुताबिक जिले के शिर्फ़ ३ लोगो ने फायर एनओसी ले रखी है लेकिन सवाल यह भी खड़ा हो जाता है की बिना बयार एनओसी के अस्पताल का लाइसेंस नहीं दिया जाने का प्रावधान है तो फिर जारी ११० अस्पतालों को लाइसेंस कहा से मिल गया यह तो शिरफ सोचने की बात है

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