कोरोना महामारी के खिलाफ आर्थिक जंग में अन्नदाता निभा सकते हैं बड़ी भूमिका

यह तो तय माना जा रहा है कि कोरोना महामारी के खिलाफ आर्थिक जंग में भी अन्नदाता ही बड़ी भूमिका निभाएंगे। लेकिन पिछले दिनों में जिस तरह औद्योगिक शहरों से गामीण क्षेत्रों की ओर हो बदहवास पलायन हुआ है उससे चिंता भी बढ़ गई है। गांव और कृषि क्षेत्र इस अचानक बढ़ने वाले बोझ को कब तक सह पाएगा यह कह पाना मुश्किल है।

माना तो यह जा रहा है कि हालात सुधरते ही ये मजदूर फिर से शहरों की ओर ही कूच करेंगे क्योंकि उनके लिए गांव में रोजगार के न तो बहुत साधन हैं और न ही शहर उन्हें गांव में रहने देगा। बहरहाल, कोरोना का कहर लंबा रहा तो गांव और शहर दोनों के लिए स्थिति खराब हो सकती है। हाल के वर्षो में रोजगार के नाम पर अकुशल मजदूरों के लिए मनरेगा को छोड़ दिया जाए तो बहुत कुछ नहीं किया गया है। देश के 49 करोड़ मजदूरों में 95 फीसद गैर संगठित क्षेत्र के श्रमिक हैं। जबकि 26 करोड़ खेतिहर मजदूरों का बोझ पहले से ही कृषि क्षेत्र उठा रहा है। कृषि क्षेत्र में मशीनीकरण को मिल रही तरजीह के नाते इनकी मांग लगातार घट रही है। यही कारण है कि स्थिति सामान्य होते ही 90 फीसद प्रवासी फिर से शहरों की ओर लौटेंगे और गांव फिर से अपने पुराने ढर्रे पर होगा।

वैसे कोरोना ने यह तो सिखा ही दिया है कि अब उत्पादन से लेकर उसकी बिक्री तक के लिए आधुनिक तरीके अपनाने होंगे। ऐसे में संभव है कि शहरों की ओर भागे कुछ युवा वापस अपने गांव में पिता का उत्तराधिकार बदलाव के साथ संभालने को तैयार दिखें। संभव है कि बड़े शहरों से कुछ नया सीखकर आए युवा अब गांव में रहकर ही अपनी पहचान बनाने का फैसला लें। अगर ऐसा हुआ तो गांव की तस्वीर और अर्थव्यवस्था दोनों बदल सकती है। कोरोना के चलते वैश्विक बाजार में खाद्यान्न की मारामारी लंबे समय तक रह सकती है। ऐसे में देश की खाद्य सुरक्षा को महफूज रखने के साथ खाद्यान्न की निर्यात मांग को पूरा करने का एक अच्छा अवसर भी है।

कृषि क्षेत्र होगा हाईटेक

कृषि क्षेत्र की सबसे बड़ी चुनौती खेती की लागत में कटौती करना है। इसके लिए कृषि क्षेत्र हाईटेक होगा। ऐसे में कृषि और उससे संबंधित अन्य उपक्रमों में आधुनिक टेक्नोलॉजी व मशीनों के प्रयोग शुरु करने का सबसे उपयुक्त समय है। चालू लाकडाउन के समय खेतों में खड़ी रबी फसलों की कटाई, मड़ाई और पैकिंग करने के लिए सभी राज्य सरकारों ने बड़ी मशीनों के उपयोग की अनुमति के साथ ई-मंडी के मार्फत किसानों की उपज की बिक्री को प्रोत्साहित किया। कृषि के मशीनीकरण का यह सबसे उपयुक्त समय है, जब किसानों को लागत घटाने और समय से अपनी उपज को मंडी तक पहुंचाने की जरूरत है। ऐसे समय में सरकार ने कस्टम हायर सेंटर के मार्फत खेती की छोटी बड़ी मशीनों को किराये पर उपलब्ध कराने और उबर-ओला की तर्ज पर टै्रक्टर्स और ट्रकों की आन लाइन बुकिंग के लिए किसान रथ जैसे ऐप मुहैया कराये। माइक्रो इरिगेशन में ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसे सिंचाई की आधुनिक टेक्नोलॉजी का प्रसार हो सकता है। इसके लिए केंद्र की ओर से पहले से ही वित्तीय मदद मुहैया करायी जा रही है। राज्यों के लिए जरूरी है कि वे इसे आगे बढ़कर स्वीकार करें।

गामीण बुनियादी ढांचे को मजबूत बनाने की दिशा में पहले से चल रही मनरेगा को सरकार से पर्याप्त प्रोत्साहन मिल रहा है, वहीं प्रधानमंत्री गाम सड़क योजना, आवास योजना व गामीण आजीविका मिशन और तेज किया गया है। ताकि गांव पहुंचे लोगों को बेरोजगार न बैठना पड़े। खेती में जुट जाने को तैयार लोगों को अब उत्पादन करने की बजाय फूड प्रोसेसिंग क्षेत्र में उतरना होगा। शहरों से बेहतर लिंक हो जाने की वजह से कृषि उत्पादों की मार्केटिंग क्षेत्र को बल मिलेगा। आन लाइन मार्केटिंग करने वाली कंपनियों की तर्ज पर गामीण क्षेत्र में ई-स्टोर्स का विस्तार होगा, जिसमें गामीण युवाओं को काम मिलेगा।

त्पादों की गुणवत्ता पर देना होगा जोर

वैश्विक बाजार में भारतीय कृषि उत्पादों की मांग को पूरा करने के लिए हाईटेक खेती के साथ उत्पादों की गुणवत्ता पर जोर देना होगा। अंतरराष्ट्रीय बाजार में मूल्य प्रतिस्पर्धा के साथ गुणवत्ता पर जोर देना होगा। यह तभी संभव होगा, जब देश में खेती वैज्ञानिक तरीके से होगी। इसके लिए सरकार के साथ निजी निवेश की जरूरत होगी। प्रोसेसिंग क्षेत्र को विकसित करने और कुशल मजदूरो की भी आवश्यकता है, जिसके लिए स्किल डवलपमेंट पर विशेष जोर देना होगा। लाकडाउन के दौरान भी 50 हजार टन गेहूं का निर्यात किया गया है। पूरी दुनिया में खाद्य उत्पादों की मांग में तेजी से बढ़ी है। लेकिन हर देश अपनी जरूरतों से अधिक मात्रा खाद्य सुरक्षा के तौर पर स्टॉक करना चाहता है। ऐसे में भारत कृषि क्षेत्र के पास पर्याप्त अवसर हैं, जिसे वह भुना सकता है।

खेती को लाभ में लाने और हर हाथ को काम देने के लिए मांग के हिसाब से करनी होगी। गैर जरूरी चीजों के बजाय गामीण गतिविधियों को वरीयता देनी होगी। निर्यात मांग को पूरा करने से खेती की दशा व दिशा दोनों बदल जाएगी। खेती घाटे का सौदा नहीं रहेगी। खेती के साथ के उद्यमो में पशुधन, डेयरी, पॉल्ट्री, बागवानी में समान ध्यान होगा। तब कहीं गामीण अर्थव्यवस्था और किसानों और खेतिहरों का उद्धार संभव है।

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