सूंड़ी कीट से तबाह हो रही मक्का की फसल दवा का छिड़काव हो रहा बेअसर

कायमगंज/फर्रुखाबाद: लॉकडाउन के कारण वैसे ही मध्यम वर्ग एवं मजदूर वर्ग बेरोजगार सा हो चला है। आज श्रमिक परिवारों के सामने अपने बच्चों के पोषण के लिए दूध आदि आवश्यक वस्तुओं के अलावा दो वक्त के भोजन की भी समस्या बनती जा रही है। वही मध्यमवर्ग में आने वाला अधिकांश छोटी जोत वाला किसान भी परेशानियों से घिरा हुआ है।

दैनिक उपभोग की वस्तुओं को जुटाने के लिए उसके पास आवश्यक धन की कमी महसूस की जा रही है। हालांकि शासन इस आपदा जैसे काल में लोगों की खाद्यान्न व किसान सम्मान निधि के माध्यम से मदद करने का प्रयास भी कर रहा है। किंतु यह प्रयास इतना नहीं है। जितनी कि इस महंगाई के काल में लोगों की सामान्य जरूरतें हैं। सरकारी मदद तो ऊंट के मुंह में जीरा या फिर ओस की बूंदों से प्यास बुझाने के जैसी पहेलियों की याद दिला रही है। ऐसे में चाहे कोई भी व्यक्ति हो अथवा परिवार या फिर वर्ग उसका भरण पोषण तथा आम तौर पर जरूरतों की पूर्ति तो सही ढंग से उसके ही द्वारा जुटाए गए श्रम एवं कार्यों से की होती है।

किसान इस समय सबसे अधिक परेशानी से गुजर रहा है। इस समय मक्का हरी चरी, उड़द, मूंग, मूंगफली आदि की फसलें खेतों में कृषक वर्ग द्वारा बोई जा चुकी हैं। मक्का की फसल व अन्य कुछ फसलें लगभग तैयार होने की स्थिति में है जबकि इन्ही फसलों का बहुत बड़ा रकबा तैयार हो रहा है और अभी तक बुवाई भी जारी है। किंतु मक्का आदि की फसल जमकर बढ़ रही है। उसमें बहुत तेजी से एक सूंड़ी कीट जैसा लगा है। यह कीट उसकी पत्ती आने वाले फूल तथा भुट्टे के ढांचे को ही चाट कर नष्ट किए दे रहा है।

जानकार किसानों का कहना है कि यह कीट लगता तो पहले भी था। किंतु एक ही बार के दबा के छिड़काव से खत्म हो जाता था। परंतु न जाने क्यों इस बार यह सूंड़ी कीट एक बार नहीं दो से तीन तीन बार तक दवा का छिड़काव करने के बावजूद भी नहीं जा रहा है। हां कुछ दिन के लिए रोकथाम जरूर हो जाती है। बार-बार दवा का छिड़काव करने से एक और जहां तैयार फसल के दाने भी खाने योग्य शायद न रहे। वहीं दूसरी ओर महंगी दवा का छिड़काव मध्यमवर्ग के किसान की आर्थिक स्थिति को भी बिगाड़ रहा है। ऐसे में मेहनतकश अन्नदाता किसान के माथे पर चिंता की लकीर उभरती जा रही है।

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