जब हिंदू पक्षकार ही रामलला के विरोध में उतर आए, तो कोर्ट ने जताई नाराजगी

अयोध्या मामले में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने उस वक्त कड़ी नाराजगी जताई जब हिंदू पक्षकार ही रामलला के विरोध में उतर आए. बेंच के प्रमुख चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने अखाड़े को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि आपका ये दावा अटपटा है कि ‘सेवियत’ यानी सेवायत होने के नाते केवल आपकी याचिका ही विचार योग्य है.

राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामले में चल रही सुनवाई के 12वें दिन सुप्रीम कोर्ट ने अखाड़े के दावे पर कहा कि जमीन के स्वामित्व को लेकर हिन्दू पक्षकार निर्मोही अखाड़ा ‘राम लला विराजमान’ की याचिका का अनावश्यक रूप से विरोध कर रहा है. चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा कि ‘सेवियत’ होने के नाते केवल उसकी याचिका ही विचार योग्य है और रामलला के अंतरंग सखा देवकी नंदन अग्रवाल के जरिए देवता ‘रामलला विराजमान’ की याचिका पर कोर्ट को विचार नहीं करना चाहिए. पीठ ने दशकों पुराने और राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामले में सुनवाई के 12वें दिन दलीलें सुनते हुए कहा कि अखाड़े के और रामलला के मुकदमों और दावों के बीच कोई द्वंद्व नहीं है. यदि रामलला जीतते हैं तो सेवियत के रूप में आपका अधिकार बरकरार रहता है.

पीठ ने कहा कि अखाड़ा अपने सेवायत के अधिकार का स्वतंत्र रूप से दावा कर सकता है. आप विरोधाभासी क्षेत्र में अनावश्यक रूप से घुस रहे हैं क्योंकि वहां आपको जाने की जरूरत नहीं है. यह काम सुन्नी वक्फ बोर्ड का है. संविधान पीठ में चीफ जस्टिस के अलावा न्यायमूर्ति एस.ए. बोबडे, न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस.ए. नजीर शामिल हैं. न्यायालय ने ‘निर्मोही अखाड़े’ की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सुशील जैन से पूछा कि यदि देवता की याचिका खारिज कर दी जाती है तो अखाड़ा किसका सेवायत रहेगा? क्योंकि आप मस्जिद के सेवायत तो नहीं हो सकते ना और यदि आपका वाद सफल होता है तो यह देवता के ही खिलाफ होगा. पीठ ने जैन से कहा कि वह मंगलवार को इस बारे में अखाड़े का रुख बताएं कि क्या वह देवता और अन्य द्वारा दायर वाद को खारिज करने की अब भी मांग कर रहा है? बता दें कि सर्वोच्च अदालत ने इस मामले में पहले मध्यस्थता का रास्ता अपनाने को कहा था, लेकिन मध्यस्थता से कोई हल नहीं निकला. जिसके बाद अदालत इस मामले पर रोजाना सुनवाई कर रही है.

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