नारी तेरे रूप अनेक भाग 15–लेखक—अनिल मिश्र एडवोकेट


अब तक यह नारी अपने सभी अस्त्रों का प्रयोग कर चुकी है।सौगन्धों से शुरू हुए इस मानसिक संघर्ष एवं अधिकारों की मांग के इस रणक्षेत्र में सौगन्धों, उलाहनों,सवाल जवाबो,शिकवे, मान मनौवल ,भावनाओं को झकझोरती आर्त पुकार,संस्कारयुक्त चेतावनी अर्थात अपने तरकश के सभी बाणों को इस्तेमाल कर चुकने के बाद भी जब यह पाती है कि पति की निष्ठुरता पर ,एक पत्थर की शिला जैसे हृदय पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है तो अपने अभिमानिनी स्वरूप को तिलांजलि देते हुए पूरी तरह समर्पण मुद्रा में आ जाती है वो कहती है
“बोलो प्रिय पूरी कर सकते हो क्या मेरी यह अंतिम इच्छा,
जीवन तो सारा छीन लिया अब मांग रही हूं इतनी सी भिक्षा”।
वो सवाल करती है क्या मेरी आखिरी इच्छा पूरी कर सकते हो उसे मालूम है, जीवन में अक्सर उसने देखा है कि मरते समय व्यक्ति की अंतिम इच्छा पूरी करने का एक सामान्य सिद्धांत समाज में सर्वमान्य है।जिसके लिए प्रत्येक व्यक्ति तत्पर रहता है । मरने वाला व्यक्ति कोई भी हो ,किसी भी वर्ग से हो,गरीब हो या अमीर,कमजोर हो या ताकतवर ,यदि उसकी कोई इच्छा कोई कामना कोई चाहत जो समाज के नियमों,सिद्धांतों, कायदे कानूनों के विपरीत न हो तो उसे पूरा किया जाना एक अघोषित कर्तव्य माना जाता है।उसने शायद कहीं यह भी सुन रखा होगा कि फांसी की सजा सुनाए गए अभियुक्त की भी अंतिम इच्छा पूरी करने का चलन था,वो भी अब अपने तरकश के अंतिम तीर,उसकी अपनी समझ के ब्रहमास्त्र का प्रयोग करते हुए अपने पति से पूछती है,


“बोलो प्रिय पूरी कर सकते हो क्या मेरी यह अंतिम इच्छा”,अधिकार की मांग तो समयानुकूल तिरोहित हो चुकी है,अब केवल वो अपनी अंतिम इच्छा की बात एक
भिक्षुणी की तरह करती है। यह कहते हुए कि “जीवन तो सारा छीन लिया अब मांग रही हूं इतनी सी भिक्षा” उसे कोई गुरेज नही है भिखारिन बनने में अपने प्रिय के सम्मुख
इस बिंदु पर वो उसको पत्नी का अधिकार न देने की अपने पति की अहंकार भरी निर्मम जिद के आगे पूर्णरूपेण आत्म समर्पण कर देती है कि चलो पत्नी न मानो मेरी अंतिम इच्छा को एक भिखारिन की भीख समझ कर ही मुझे दे दो उसका सोचना है शायद इसी तरह से उसके पति की भावनाओं में ज्वार आ जाये या वह पसीज जाए और इसीलिए वो अपना सारा स्वाभिमान ,मान सम्मान पत्नी होने का हक, भी दांव पर लगा देती है छोड़ देती है और एक भिखारिन की मुद्रा में गिड़गिड़ाती हुई अपने जीवन की चौसर पर सब कुछ हार चुके जुआरी की तरह आखिरी बार पाँसे फेंक देती है शायद यही दांव उसे जीत दिला दे।
आइए देखते है यह आखिरी दांव क्या है ? अब अपना सब कुछ सर्वस्व छोड़ कर वो क्या मांगने पर आ गई है उसकी अंतिम इच्छा आखिरी मांग वो भी इस अंदाज में क्या है क्यों है?
इन सभी सवालों के जवाब और इस रहस्यमय स्थिति से पर्दा उठने के बाद क्या देखने को मिलता है? सभी कुछ आगे आने वाली किश्त में,तब तक आप भी अपनी कल्पना के घोड़े दौड़ाइये अभी के और आज के इन यक्ष प्रश्नों का उत्तर खोजने में तब तक के लिए सबको राम राम राम सबको मेरा सलाम
अनिल मिश्र एडवोकेट फर्रुखाबाद मो०9455065444

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