नारी तेरे रूप अनेक भाग -16- लेखक अनिल मिश्र एडवोकेट


और अब यह आखिरी दावँ भी वो चल देती है यह कहते हुये अपनी अंतिम इच्छा जाहिर कर देती है
“हो सम्मुख तुम मेरे प्रिय जिस पल छूट रही हो सांस आखिरी,
बाँहों की सुरक्षा का सम्बल हो, अब केवल है ये आस आखिरी।।
हो सम्मुख………….. ……………
“बस केवल इतना मैं चाहती हूं कि जिस समय आखिरी सांस छूट रही हो तुम मेरे सामने हो,मैं बस जी भर कर तुम्हे निहार लूं वो चेहरा जिसकी बरसों पहले की धुंधली याद भी मेरे ह्रदय में हमेशा ताज़ी रही, को जी भर कर अपनी आंखों के जरिये आत्मसात कर लूं अब उसे अपनी मृत्यु का भय नहीं है।प्रेम की पराकाष्ठा का यह स्वरूप उसको एक योगिनी, एक सन्यासिनी की मानसिकता में ले जाता है जिसे न तो मौत का भय है न जिंदगी की चाहत है चाह है तो केवल एक कि अपने पति के स्वरूप को निहारते हुए प्राण छूट जाएं मानो सारे जीवन का आनन्द ,सारे जीवन के दुःखो,पीड़ा,अभावों के पल का प्रतिदान इन क्षणों में उसे मिल जायेगा वो आगे अपनी जीवन भर की अतृप्त इच्छा का खुलासा करते हुये कहती है कि “बाँहों की सुरक्षा का सम्बल हो अब केवल है ये आस आखिरी” ।
उसका मानना है कि जीवन भर जिन बाँहों के सहारे को वो तरसती रही तड़पती रही पता नहीं कितनी रातों को करवटें बदल बदल कर जिस सुरक्षा के भाव के अभाव में एकाकी काटा है वह जीवन भर की अतृप्त इच्छा अतृप्त कामना यदि आखिरी सांस के वक्त पूरी हो जाती है तो सारा जीवन ही सार्थक हो जाएगा इसीलिए एक भिखारिन के रूप में भी केवल इन्ही दो वरो के पाने की भीख की इच्छा व्यक्त करती है फिर बड़े मासूम अंदाज में पूछ लेती है


“छोड़ो भूली बिसरी बातें क्या इतना भी ना दे पाओगे”।
वह राजपाट नहीं मांग रही है, पत्नी होने का अधिकार भी नहीं मांग रही है,केवल इतना चाहती है कि मृत्यु के समय पति का चेहरा उसके सामने हो,पति की बाँहों का सुरक्षा सम्बल उसके पास हो इस सुरक्षा कवच के घेरे में यदि मृत्यु भी आ जाए उसे उसका भय नहीं उसके जीवन की समस्त अतृप्त कामनाओं को बस इतने से ही सम्पूर्ण तृप्ति मिल जाएगी वह पूरी तरह से संतोष,शांति,सकून के साथ अपनी जीवन यात्रा पूरी करके मृत्यु का आलिंगन कर लेगी ।क्या सुखद मृत्यु की कल्पना है इस पतिव्रता नारी की ,पति की बाँहों का आलिंगन कब मृत्यु के आलिंगन में परिवर्तित हो जाएगा उसे पता भी नहीं चलेगा और चल पड़ेगी वह एक नई अनन्त यात्रा की ओर,इस दुख भरे जीवन को छोड़ कर सारे कष्ट सारी पीड़ा सारी अतृप्त कामनाओं के वस्त्रों को यहीं उतार कर।उसके लिये मृत्य भी इस जीवन के सारे दुःखों की तुलना में सुखमय होगी।उसके मन का यह विचार,मृत्यु को निर्विकार,निर्विरक्त भाव से सुखदायी मानना एक अधिकार विहीन जीवन जीने वाली पतिव्रता पत्नी के ही मनो मष्तिष्क में आना सम्भव हो सकता है।


और यहां पर आकर इस परिकत्यक्ता पत्नी की जीवन कहानी एक दोराहे पर आकर खड़ी हो जाती है।जिसमें एक रास्ते पर जाने पर इसका अंत सुखान्त तथा दूसरे रास्ते पर जाने से दुःखान्त होगा अब यह आप पर छोड़ते है कि ये किस रास्ते पर चल दे आपके सुझाव आमंत्रित हैं।आपने एक पाठक के रूप में इस नारी के जीवन के प्रत्येक पल को न केवल स्वयं जिया होगा वरन हर सुख दुख को भी अपने मनो मस्तिष्क में भोगा होगा ।इस नारी के मनोभावों की मंझधार में हिचकोले भी खाए होंगे। हां इसको पढ़ने में आपने अपने जीवन का जो बहुमूल्य समय, स्वयम को इसकी व्यथा कथा का एक मूक दर्शक रह कर दिया है ,लेखक का जो उत्साहवर्धन किया है उसके लिए मैं व्यक्तिगत रूप में न केवल आभारी हूँ वरन कृतज्ञ हूँ विश्वास है कि भविष्य में भी इसी प्रकार आप उत्साह बढ़ाते रहेंगे जिससे कलम धर्म का सुचारु रूप से पालन सम्भव होगा। मेरा आग्रह है इस अंतिम मोड़ पर अब कुछ समय आप लेखक के स्थान पर हैं मैं पाठक होऊंगा। कृपया अपने मनोभावों से निम्न पते या फोन न० पर मेरा मार्ग दर्शन करने की कृपा करने का कष्ट करें जिससे इस कथानक को पूरा किया जा सके।
शुभ कामनाओं सहित
आपका–अनिल मिश्र एड०
4/14 A नाला शिम्त शुमाल पक्का पुल
फर्रुखाबाद ।फो०न०-9455065444

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