नारी तेरे रूप अनेक-17- लेखक- अनिल मिश्र एडवोकेट


हर प्रकार के एवम नारी के मनोभावों व क्षमताओं के हर एक अस्त्र शस्त्र का इस्तेमाल कर चुकने के बाद भी जब इस परित्यक्ता नारी के पाषाण ह्रदय पति की विचारधारा में कोई भी परिवर्तन नही होता है और वह इसे स्वीकार करने को तैयार नही होता है तो एक बार पुनः इस नारी की विचारधारा में एक बड़ा परिवर्तन आता है।विगत अतीत एवम अतीत के दुख भरे जीवन व कष्टों के बारे में वह सोचती है कि 18 वर्ष की उम्र में शादी के तत्काल एक साल बाद पति ने उसको छोड़ दिया था,आज वो 38 वर्ष की हो चुकी है अभी भी बाकी का सारा जीवन न तो सुहागिन न ही विधवा, बस केवल दुःखो के झंझावातों में ही गुजारना है।पिछले 20 साल के एकाकी कष्टप्रद जीवन की याद ही उसके रोंगटे खड़े कर देती है।

खास तौर पर इधर तो वो अपने सारे के सारे प्रयासों के असफल हो जाने के बाद एक अजीब सी मानसिक अवसाद जैसी मनःस्थिति से घिर कर उस दशा में पहुंची जा रही है जहां कभी कभी तो मृत्यु ही उसे नवजीवन सा लगने लगी है,किसी किसी क्षण तो ऐसे नराधम निर्दयी हैवान से बदला लेने की प्रतिशोध की भावना भी इतनी बलवती हो जाती है कि लगता है की अभी निमिष मात्र में उसके सम्मुख पहुंच कर अपने जीवन के एक एक पल का हिसाब कर ले।लेकिन शीघ्र ही बदरी की छांव जैसा स्वयम के असहाय,अकेली अबला होने का ख्याल इस भाव को तिरोहित कर देता।इन्ही विचारों के पेशोपेश में वो कभी तो बदला लेने को व्याकुल किसी नागिन सी तो कभी शिकारियों से अपने प्राण बचाती झुंड से बिछड़ी रास्ता भटक गई निरीह हिरनी सी अपनी मनःस्थिति में और भी मतिभ्रमित हो उठती है।

और अंत में किसी मकड़जाल में फंसे किसी फड़फड़ाते फड़फड़ाते निढाल हो चुके कीड़े की स्थिति में आकर मृत्यु को गले लगाने के दृढ़ निश्चय के साथ निकल पड़ती है दिशाविहीन अपने में ही आत्म केंद्रित,सुध बुध खोये,निराशा के गहरे गर्त में डूबी छटपटाती दिग्भ्रमित सी। तभी सूनसान सड़क पर दूर से आती एक कार देख कर जैसे उसकी समस्त सुषुप्त चेतनाएं जागृत होकर मुहँ मांगी मुराद,मृत्यु को गले लगाने की इच्छा पूरी करने का अवसर देख कर चेतन हो जाती है और कार के नजदीक आते ही वो जिन्दगी से छुटकारा पाने के अपने फैसले को क्रियान्वित करने के लिये दृढ़ इच्छा शक्ति से कर के आगे कूद कर क्षणांश में लागू कर देती है चेतना के विलुप्त होते होते बस केवल एक ख्याल बिजली की कौंध सा उसके जहन में लपकता है कि चलो सब दुःखों से छुटकारा मिल गया।
अब आगे क्या होता है ? शेष अगली किश्त 18वी में।
अनिल मिश्र एडवोकेट फर्रुखाबाद उ०प्र०
मो०न०9455065444

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