नारी तेरे रूप अनेक-18 – लेखक- अनिल मिश्र एडवोकेट

और फिर लगभग 15 दिन की गहन बेहोशी के बाद एक दिन धीरे धीरे होश में आने की प्रकिया से गुजरते हुये किसी गहरी तन्द्रा से उबरने के एहसास के साथ जब वो होश में आती है तो पाती है अपने को अस्पताल के एक कमरे में बेड पर जहां किसी बुजुर्ग की दो आंखे सारे संसार की करुणा पीड़ा एवं प्यार को संजोए, व्याकुल मगर खुशी के साथ उसको निहार रही होती हैं। दो हथेलियों की स्नेह से ओत प्रोत छुअन को अपने माथे पर महसूस कर उसे लगा कि जैसे अपने बचपन की यादों में फिर से नहाँ गई हो,ऐसे ही तो एक बार बुखार की बेहोशी से होश में आने के वक़्त उसने इसी मुद्रा में अपने पिताकी करुणामयी, प्यार व खुशी में डूबी निगाह को देखा था,ऐसे ही वात्सल्य भाव से भरे स्पर्श को अपने माथे पर महसूस किया था इन्ही यादो के सम्मोहन में डूबी बेसाख्ता वह बोल उठती है “पापा”। और जवाब में मिलता है किसी बुज़ुर्ग का स्नेहपूर्ण मगर दिल की गहराइयों से फूटता संबोधन “बेटी”, और साथ में आंखों से झर झर बहते आंसुओं के प्यार भरे सम्बल ने जैसे उसके बरसों से दहक रहे तप्त ह्रदय पर ठंडे पानी के छींटे डाल दिए थे। इसी सकून, इसी शांति इसी सुरक्षा के एहसास को पाने को मां की मृत्यु के बाद से तड़प रही थी,जैसे बरसों से दाने दाने को तरस रही जिंदगी को भरपेट छप्पन भोग की तृप्ति मिल गई हो। तभी उसके कानों में आवाज पड़ती है”बेटी कैसा लग रहा है,अब तो ठीक हो


लाख लाख शुक्र है ऊपर वाले का उसने मेरी प्रार्थना सुन ली,कहीं तुम्हे कुछ हो जाता तो मैं जिन्दगी भर खुद को माफ नहीं कर पाता।और अब तो उसे होश में आये 10 रोज से भी ज्यादा समय हो गया था,इस बीच में वह उन बुजुर्ग की भी जीवनगाथा से भलीभांति परिचित हो गई थी। वह कलकत्ता के एक जमींदारी परिवार के धनाढ्य व्यक्ति थे,जिन्हें तपन बाबू के नाम से लोग पुकारते थे।तपन बाबू के एक ही पुत्री थी जिसका नाम मनु था।मनु की काफी अर्से पहले एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। उनकी पत्नी भी 10 साल पहले गुजर गईं थी।इतना ऐश्वर्य, वर्चस्व सम्मान,धन सम्पन्नता सब कुछ होने के बाद भी तपन बाबू अपने मन के किसी कोने में नितांत एकाकी व निर्धन से हो गए थे।जिसे किसी अपने से प्यार के दो बोल सुने मुद्दतें गुज़र गईं थी।बेटी मनु के गुज़र जाने के बाद पापा कहने वाला कोई और नहीं था। पापा सुनने में बहुत छोटा सा सम्बोधन लेकिन अपने अंदर प्यार,ममत्व,सुरक्षा,संरक्षा के महासागरों को संजोए कितना विशाल,जब कोई बेटा या बेटी ललक कर अपने पिता को पुकारता है तो शायद पिता को दुनिया के सारे सुख, सारी की सारी संतोष की अनुभूति ही नही वरन स्वर्ग के भी सारे सुख इन दो शब्दों के आगे बौने हो जाया करते हैं।प्यार के दो बोल के लिए बरसों से तरस रहे किसी व्यक्ति को उसके ओंठों से निकले “पापा” शब्द ने भावनात्मक रूप में कितना अमीर कितना धनवान बना दिया था मानो सारी दुनिया की जागीर ही उसको मिल गई हो।


उसे याद है वो क्षण जब तपन बाबू उसके धर्मपिता ने उससे कहा था “बेटी आज अस्पताल से छुट्टी हो जाएगी “,और अस्पताल से दोपहर में डिस्चार्ज होने के बाद जब वो उनके साथ अस्पताल के बाहर आई तो क्या देखती है एक चमचमाती सी बड़ी कार जिसमे वर्दीधारी एक ड्राइवर बैठा हुआ था,पापा ने कहा “बैठो बेटी”,उसने आश्चर्यचकित होकर पूछा “कहाँ पापा” जवाब मिला “अपने घर”…..”किन्तु” वो इतना ही कह पाई थी कि पापा ने बड़े अधिकार लेकिन फडफडाते ओंठों से कहा” ना बेटी ना अरसे पहले एक दुर्घटना में जिस बेटी को खो दिया था आज एक दुर्घटना से उसी को बचा कर घर वापस ले चल रहा हूं ना मत कहना अपनी बेटी को दोबारा खोने का गम बर्दाश्त नहीं कर पाऊंगा”,और यह कहते कहते वो खामोश हो गए किन्तु उनकी खामोश निगाहों ने कुछ न कहते हुए भी इतना कुछ कह दिया कि वो निःशब्द कार की सीट पर बैठ गई (और अब शुरू होता है इस योगिनी के जीवन का दूसरा सफर,कितना सुखद कितना दुखद यह तो वक़्त ही बताएगा भविष्य में झांक पाना बड़ा दुष्कर कार्य होता है किंतु आज से आपकी अत्यंत प्यारी इस योगिनी के इस सफर के लिए हमारी आपकी मंगलकामनाएं, देखें कितनी फलीभूत होती हैं या निष्फल जाती हैं विधाता की मर्ज़ी) शेष अगली 19वी किश्त में।
अनिल मिश्र एडवोकेट फर्रुखाबाद उ०प्र०
मो०न० 9455065444

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