-19 नारीतेरे रूप अनेक- लेखक अनिल मिश्र


                     और अब तो उसे अपने इस घर में आये 6 महीने से ज्यादा समय हो चुका है इस महलनुमा हवेली की दरों दीवारे बगीचे के एक एक फूल और पत्तियों से तो उसकी दोस्ती हो ही गई थी,घर में भी तीन और प्राणी थे एक तो झगड़ू काका जो सुबह से शाम तक बगीचे की देखभाल,  रखरखाव करते रहते थे झगड़ू काका का भी जो कुछ था यही परिवार था सुनते हैं एक लड़का था जो बुरी सोहबत में आवारा निकल गया था बम्बई की चकाचौंध और माफिया डानों के किस्से सुन सुन कर एक बार बम्बई क्या गया फिर लौट कर नही आया न ही उसका कुछ अता पता ही मिला कभी उड़ती उड़ती सी खबर मिली थी शायद मारा गया था उनकी धर्मपत्नी ने भी उसके जाने के बाद उसके गम में ऐसा बिस्तर पकड़ा कि फिर छोड़ा ही नही आखिरी सांस के पहले फिर उनकी अर्थी को ही श्मशान पहुंचा कर लौटे थे झगड़ू काका और फिर कभी पापा को मिल गए थे जो उन्हें घर ले आये थे अब तो 15 साल हो गए होंगे इस वाकये को उम्र भी अब 55/60 से कम नही थी लेकिन उनकी फुर्ती चुस्ती में कोई कमी नही थी।पता नही उनका नाम बचपन में झगड़ू किसने रख दिया था बेचारे बोलते भी इतना धीमे से थे कि कभी कभी तो कानों पर जोर देना पड़ता था।


‌                    एक दूसरे प्राणी जो घर के ही सदस्य ही थे “बच्चू चाचा” थे। जो केवल नाम के ही चाचा नही वरन सबसे पुराने एक विश्वस्त भाई की भूमिका का निर्वाह करने में “भरत सम भाई” की परिकल्पना सार्थक करते थे। बताते हैं कि पापा की शादी के  वक़्त छोटे से बच्चू मम्मी के साथ भेजे गए थे और उस समय की प्रचलित रीति रिवाजों के अनुसार कथित दहेज के अंग बन कर आये छोटे से बच्चू लाल काल के प्रवाह में आज के बच्चू चाचा इस परिवार का अभिन्न अंग हो गए थे ।पापा भी सबसे ज्यादा बच्चू चाचा पर ही भरोसा करते थे।यहां तक कि हवेली की चाभी से लेकर तिजोरी की चाभी तक को हिफाज़त से रखने का उत्तरदायित्व पापा ने बच्चू चाचा को ही मम्मी की मृत्यु के बाद से ही सौंप रखा था।  पता नहीं कितनी खट्टी मीठी यादो व घटनाओं के चश्मदीद गवाह रहे बच्चू चाचा को देखते ही शायद पापा को पहली बार डोली से उतरती मम्मी की छवि के अलावा और कितनी कुछ झलकियां जीवन्त हो उठती होंगी जो विस्मृति के गर्त में जा चुकी थी ,जिससे उनका स्नेह ,अपनापन और लगाव मम्मी के न रहने के बाद कुछ और ज्यादा गहरा गया लगता था।बच्चू चाचा ने भी इस हवेली में अपने बचपन को बड़ा होते,किशोर होते तो देखा ही था,युवा मन के तमाम सपनों के ताने बाने भी इसी हवेली की छत पर रातों में चाँद सितारों से मूक वार्तालाप के बीच बुने थे।

फिर एक दिन शहनाई की गूँज के साथ बासंती चाची भी बच्चू चाचा के अभी तक सूने पड़े मन  के मंडप में भाँवरें डाल कर इसी हवेली के आंगन में उतर आईं थी।यह तीनो लोग कहने को तो सर्वेन्ट क्वाटर में रहते थे लेकिन विश्वास की नींव पर खड़े इनके चरित्र ने इन्हें हवेली के किसी भी कोने में बेरोक टोक आने जाने का अधिकार दे रखा था।उसे याद है यहां आने के दो चार दिन बाद एक दिन बच्चू चाचा ने उसे चाभियों का एक गुच्छा पकड़ाते हुए कहा “मालकिन बिटिया लो सम्हालो अब अपनी अमानत मैंने मालिक से भी पूछ लिया है” मैंने थोड़ा सा झूठा दिखावटी गुस्सा करते हुए कहा “चाचा बहुत गलत बात है पहली बात तो आज के बाद कभी मालकिन मत कहना मैं  जैसे पापा की बिटिया हूँ, आपकी भी भतीजी हूं बेटी हूं, फिर यह सब क्या है ये गुच्छा मुझे क्यों दे रहे हो”,बच्चू चाचा ने हाँथ जोड़ कर गिड़गिड़ाते हुए कहा “बिटिया यह इस हवेली की और तिजोरी तथा अलमारियों की चाभियाँ है भाभी के मरने के बाद मालिक भईया ने मेरे पास ही रख छोड़ी थीं मैने उनसे भी पूछ लिया है मेरे लिए बहुत बड़ा बोझा था किसी तरह अब तक सम्हाले रहा अब आप अपनी अमानत सम्हालो”।तब से सभी ने बिटिया कहना ही नही बल्कि दिल से भी बेटी मान भी लिया है ।
‌      बसंती चाची जिनके बारे में आगे बताऊंगी ………………….(शेष अगली 20वी किश्त में)
‌अनिल मिश्र एडवोकेट फर्रुखाबाद उ०प्र०
‌मो०न०9455065444

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