भाग -23 – नारी तेरे रूप अनेक- लेखक अनिल मिश्र एड० फर्रुखाबाद उ०प्र०


सामने की खिड़की के उस पार आसमान को झाँकती उनकी निगाहों के सामने जैसे पिछली घटनाओं की फ़िल्म चलनी शुरू हो गई थी,जिसमें एक पात्र वो स्वयं रह चुकी थीं।वो खुद भी इस समय वर्तमान की जगह अतीत का अंग ही प्रतीत हो रही थीं।चाची ने बताना शुरू किया,”बिटिया क्या बताऊँ मेरी तो मति ही मारी गई थी,शादी के सालों साल बाद भी जब घर में किलकारी नहीं गूँजी और पीछे पीछे निरबंसिया, निपूती की कनफूसियां होने लगीं सच्ची कहूँ बदन में आग लग जाती थी माथा जरने लगता था,ऊपर से तुम्हारे चाचा की आंखों से छलकता उनके दिल का दर्द मुझसे ज्यादा कौन समझ सकता था मैं तो पागल सी हो गई थी।सब उपाय कर लेने के बाद भी जब फेल रही तो बस एक जिंदा लाश सी इधर से उधर डोलती फिरती थी।

कई बार तो यह भी सोचा कि ऐसी जिंदगी से मौत भली लेकिन तुम्हारे चाचा का चेहरा आंखों के सामने आकर रोक देता था।कहते हैं ना, न इस करवट चैन, न उस करवट चैन।कभी तुमने सूखे में मछली को बिना पानी तड़पते देखा है वैसी ही हालत बिटवा हमार भी हो गई थी।इसी बीच कुछ ऐसा हुआ कि मेरी बहन को खुशी होने को हुई जीजाजी अकेले थे ना माँ बाप न भाई बहन न आगे नाथ न पीछे फगहा बस मियाँ बीबी दो टुटरुं टूँ ,प्राइवेट नौकरी करते थे पहला पहला मामला होने की वजह से दोनों बहुत घबड़ा रहे थे।बहन ने खबर भेजी कि जीजी न हो थोड़े दिन हमारे पास ही चली आओ तुम रहोगी तो बड़ा सहारा बना रहेगा।अब क्या करती बिटिया मालिक से छुटटी लेकर जाना पड़ा।तुम्हारे चाचा ही तो छोड़ कर आये थे।

कलकत्ता से ट्रेन से हम लोग रामपुर हॉल्ट स्टेशन उतरे वहां से किराए की गाड़ी में आटला गावँ छोड़ कर दूसरे दिन तुम्हारे चाचा वापस लौट आये थे।वही रहने के दौरान ही मालूम हुआ कि आटला गावँ तो बंगाल के मशहूर सिद्ध तांत्रिक वामाखेपा का गावँ है जहां उनका जन्म हुआ था वही से दो किलोमीटर पर माता काली का तारापीठ व महाश्मशान है।बताते हैं कि माँ तारादेवी ने अपने सबसे प्रिय शिष्य तांत्रिक वामाखेपा को वहीं के महाश्मशान में ही दर्शन दिए थे। महा तंन्त्रिक वामाखेपा के अनुसार मां काली ने बाघ की खाल पहन रखी थी उनके एक हांथ में तलवार,एक में मानव कंकाल की खोपड़ी ,एक में कमल का फूल और एक में शस्त्र था,केश खुले हुये जीभ बाहर निकली हुई तथा पैरों में पायल पहने थीं।बताते थे कि मां तारापीठ के मंदिर व महातान्त्रिक वामाखेपा की समाधि के दर्शन कर मानी हुई मनौती पूरी हो जाती है।

यह भी मशहूर था कि खास तौर पर दीपावली की अमावस्या की रात को महाश्मशान में एक से बढ़ कर एक तान्त्रिक इकट्ठे होते हैं कोई भी खुश हो गया तो जो कह देते हैं पूरा हो जाता है।वैसे बहुत क्रोधी स्वभाव के होते हैं जल्दी प्रसन्न भी नही होते।खास तौर पर अघोरियों के लिए यह भी कहा जाता था कि वह मुर्दे का मांस खाते है शराब पीते हैं और शवसाधना करते हैं। बिटवा पहले तो यह सब बांते सुन सुन कर मेरे रोंगटे खड़े हो गए थे सचमुच बहुत डर लगा था बड़ी अजीब हालत हो गई थी मेरी एक तरफ तो बरसो से दिल मे दबी हुई अकेली लालसा के पूरी होने की उम्मीद दूसरी ओर यह सब बांते संयोग से 5/6 दिन बाद ही दीवाली की अमावस्या की रात थी बस बिटिया मेरा दिमाग तो इतना घूम गया था सांप छछून्दर जैसी हालत थी मैं अपनी ही सोच के मकड़जाल में उलझ कर रह गई थी।


सच मानो बिटिया एक बात तो मुझे अंदर ही अंदर साल रही थी इसके पहले जीवन में मैंने तुम्हारे चाचा से कोई बात छुपाई नही थी एक ओर यह भी डर koथा कि कहीं मना न कर दें दूसरी तरफ
संतान की लालसा की ममता बार बार जाने की तरफ खींचती ले जा रही थी।जैसे तेरी चाची के अंदर बैठी एक और चाची सलाह दे रही हो कि बासंती जिंदगी में बार बार मौके नहीं मिलते फिर यह तो यहां तक तुझे माँ ने ही बुला लिया है वरना कैसे आ पाती।भूल जा सब कुछ चाचा नाराज होगें तो पैर पड़ जाना क्षमा मांग लेना बता देना किया तो सब कुछ आपके लिए ही आपका ही नाम आपकी पीढ़ी चलाएगी।फिर तो बिटिया सब भूलभाल कर दिल कड़ा करके हमने फैसला ले ही लिया अमावस्या की रात महा श्मशान जाने का।
आगे दीवाली की अमावस्या की रात,महा श्मसान का वातावरण और चाची,फिर क्या होता है अगली किश्त में

अनिल मिश्र एडवोकेट फर्रुखाबाद उ०प्र०
9455065444

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