भाग -24 – नारी तेरे रूप अनेक- लेखक अनिल मिश्र एड० फर्रुखाबाद उ०प्र०

अभी चूंकि अमावस्या की रात आने में 5/6 दिन थे तो बिटवा हमने सोचा रात के अंधेरे में पहली बार जाने से कहीं रास्ता न भूल जाऊं तो अच्छा है पहले एक बार हो लिया जाए,माँ के दर्शन भी हो जाएंगे । मां के दर्शन का सुना था सुबह शाम बस दो वक्त होते हैं,बस बिटिया सुबह सुबह मैं पहुंच गई मंदिर लाल और दूधिया पत्थरों से बना मंदिर इतना शानदार लग रहा था कुछ पूछो मत। देवी मइया का परसाद लिया 4 दोने परसाद नारियल,पेड़ा,इलायची दाना के लिए,कंडिया में माचिस अगरबत्ती रखी इनमें एक दोना तुम्हारे चाचा के नाम का भी था बिटवा दो ही चीजों का तो सहारा था एक तुम्हारे चाचा का ख्याल दूसरा बहन,बहनोई ने भी बताया था कि सिद्ध अघोरी सबके भले की भावना रखते है खास तौर पर तारापीठ श्मशान के, किसी से कुछ मांगते नहीं अपनी साधना में ही मस्त रहते हैं।हाँ इक्का दुक्का गंदी मछली तो हर तालाब में पाई जाती है अब एकाध ढोंगी तो इधर भी आ ही जाते होंगे दीवाली पर तो इनकी भीड़ हो जाती है खुद होशियार रहना चाहिये।
माँ की मूर्ति के सामने पहुंच कर जब दर्शन किये तो टकटकी सी बंध गई ,माँ के चेहरे पर तीन आंखें और सिंदूर से रंग हुआ मुख, मैं तो सुधबुध ही खो बैठी थी


जैसे सब कुछ भूल गई थी बस केवल माँ चंडी थी और उनकी भगतिन मैं। तभी मन्दिर में बज रहे नगाड़े की आवाज से जैसे नींद खुली,मैं बड़े हल्के माहौल में बाहर आई और महाश्मशान की ओर चल पड़ी यहाँ भी मां का मन्दिर है जिसके पास ही थोड़ी दूर पर महाश्मशान है उसके दूसरे ओर द्वारिका नदी बहती है।


बताते हैं सबसे पहले मां के चरण यहीं पड़े थे यहीं महातांत्रिक वामा खेपा जी की भी समाधि है जहां लाल रंग के समाधि मन्दिर में बाबा वामाखेपा की लाल रंग का एक वस्त्र पहने बैठी हुई मूर्ति है।बाबा के दर्शन करके मैं महाश्मशान पहुंची वहां तो बिटवा बड़ा अजीब सा था सब, कुछ अघोरी पेड़ो के नीचे धूनी रमाये किसी छोटी सी चीज से फूंक मारते और मुहँ से ढेर सारा धुआं छोड़ रहे थे और कड़कती आवाज में कुछ चिल्लाते भी थे । कुछ लाल कपड़े में,तो कोई केवल लंगोटी लगाए शरीर में भस्म लपेटे, तो कोई काले कपड़े में,एक अघोरी ने तो एक करीब करीब जल चुकी चिता के इर्द गिर्द अपने चिमटे से लकीर खींची और हवा में चिमटालहराते हुए चिटा के सिरहाने ही जमीन में गाड़ कर बैठ गया।बिटवा वहां तो बीस बीस पचीस पचीस फुट पर मिट्टी की पत्तो से बनी झोपड़ियां पड़ी हुईं थी जिनमे तंन्त्रिक अघोरी बैठे थे सुना था दीवाली की अमावस्या की रात तो तांत्रिकों की भीड़ सी होती है।दूर दूर के अघोरी कोई किसी साधना को पूरी करने,तो कोई किसी सिद्धि को पाने के लिए आते है।अपुन ने रास्ता तो समझ ही लिया था महाश्मशान भी देख लिया था फिर बिटवा वापस हो ली,अब तो घर पहुंच कर बस अमावस्या की रात का इंतज़ार करना था।


बस थोड़ा सा इंतज़ार और एक दो दिन बाद दीवाली की अमावस्या की ही रात है)शेष अगली किश्त में
अनिल मिश्र एडवोकेट फर्रूखाबाद उ०प्र०
मो० न० 9455065444

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