भाग 25- नारी तेरे रूप अनेक-लेखक अनिल मिश्र एड


और फिर आई दीवाली की अमावस्या की रात,मेरी जिंदगी के सबसे बड़े इम्तहान की रात,अरे क्या बोलते हैं उसे मुआ एक मुहावरा भी तो है,हुहं गले मे है जुबान पर नही आ रहा है,अरे बिटवा वो ……ओ …. क्या कहते हैं हाँ कतल की रात अब मेरी तो उस दिन कतल की ही रात थी।
घनघोर अंधेरी काली रात,12 से 1 बजे के बीच का समय,पीपल,बरगद शीमल के पेड़ों के पत्तों के बीच से गुजरती तेज हवा की सरसराहट, कुत्तों के रोने की आवाजों के बीच रुक रुक कर आती उल्लू की डरावनी चीख,द्वारिका नदी का हरहराता शोर,चारो ओर जलती चिताएँ, बिटवा तारामती देवी के महा श्मशान में रात में भी मुर्दे जलाये जाते हैं कनावत थी कि वहाँ चिता की लपट कभी शान्त नही होती। इधर उधर घूम रहे अघोरी फिर वहां मुर्दा जलाने का तरीका भी अलग था कोयले की चिता पर मुर्दा रखा जाता है आधा हिस्सा लटकता रहता है दो डोम जैसे लोग बांस से जलते समय मुर्दे को मोड़ते जाते हैं फिर मोड़ कर गठरी जैसी बना देते है।चिता की लपट शांत होने तक अघोरी भी आस पास घूमते रहते है।बाबा रे बाबा मेरा तो रोयां रोयां खड़ा हो गया था।
तभी वहाँ से पास में ही मिट्टी और पत्तों से बनी एक झोपड़ी चिता की लपटों के प्रकाश में दिखाई दी जो बाहर से काफी खुली हुई थी,हवन कुण्ड से ऊंची ऊंची लपटें निकल रही थी जिनकी रोशनी में देखा कि वहां बैठा एक काफी लम्बा चौड़ा अघोरी हवन कुंड में बार बार कुछ डाल रहा था,मेरे पैर अपने आप उस तरफ मुड़ गए।बिटवा वहाँ इतनी तेज दुर्गन्ध आ रही थी जैसे आदमी या जानवर के सड़ने पर,एक मिनट के लिए भी खड़ा हो पाना सम्भव न था अंदर से उबकाई भी आ रही थी पर बिटवा तुम समझ सकती हो संतान की लालसा क्या होती है मैं सब कुछ बर्दाश्त करके बैठ गई,लेकिन उस अघोरी पर तो कोई असर ही नही था बड़ा बेढब से था वो अघोरी बाबा,लम्बी दाढ़ी अंदर तक घूरती लाल लाल भयंकर आंखें,हवन कुंड के पास पड़ी मानव खोपड़ियां,गले में पड़ी इंसानी हड्डियों की माला जैसे रीढ़ की हड्डी नही होती है,एक हाथ में लिए हुई खोपड़ी में से कुछ पी रहा था,दूसरी तरफ रखी खोपड़ी में से कुछ निकाल कर खाया ऐसा बदबू का भभका उठा कि कुछ पूछो मत तभी मुझे भी समझ में आया इसी सड़े मांस की बदबू थी जो चारो ओर फैली हुई थी,हवनकुंड के पास ही एक त्रिशूल गड़ा था एक बड़ा सा चाकू पड़ा था कुछ छोटे छोटे गुड़िया जैसे पुतले भी जमीन पर पड़े थे।उसने खोपड़ी से फिर कुछ पिया एक डकार ली फिर गरजा


“आदेश,जाग बाबा जाग,जाग मसान जाग।बोल कैसे आई”,मैंने बड़ी हिम्मत जुटा कर कहा “बाबा सन्तान चाहिए”उसने एक लम्बी हुंकार भरी”हूँ……….मिलेगी
मिलेगी भैरों साधना करनी होगी रात भर करेगी”?मैंने कहा “करूँगी बाबा”वो बोला “जा सामने नदी में नहा कर आ सुन कपड़े वहीं उतार कर आना चिता की भस्म शरीर में मल कर रात भर निर्वस्त्र बैठना होगा तेरी मुराद पूरी होगी”और बिटवा मैं नदी में नहाने को चल पड़ी जाने कैसा जादू सा कर दिया था उसने जैसे वशीकरण कर दिया था।वो तो बिटवा तेरे चाचा के पुण्य थे या तुम लोगो का भाग्य या परमात्मा की किरपा कि आधे रास्ते पर ही जमीन पर पड़ी एक खोपड़ी से ठोकर क्या लगी में जैसे बेहोशी से जाग गई सब समझ मे आ गया फिर तो बिटवा में इतना जोर से भाग ली मत पूछो बस तम्हारे चाचा याद रहे और बहन का घर,दरवाजे पर पहुंच कर किवाड़ों पर हाँथ मारा और बेहोश हो गई।जब होश आया तो देखा तेरे चाचा माथा सहला रहे थे मालूम है मैं
24 घण्टे से ज्यादा बेहोश रही थी।बाद में चाचा ने पूरी कहानी सुन कर कहा “पगली कहीं की वो ढोंगी अघोरी बाबा था तारा मइया ने बचा लिया तुझे,अब कभी कोई बात छिपा कर मत करना,वो दिन है और आज का दिन दइया रे मैं तो हवेली के बाहर ही नही निकलती हूं।और बोली चल बिटवा तुझे भी नींद आ रही होगी सोया जाए
अनिल मिश्र एडवोकेट फर्रुखाबाद उ०प्र०
मो०न०9455065444

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