27-नारी तेरे रूप अनेक लेखक अनिल मिश्र एडवोकेट


गाना बजाते बजाते उसे ऐसा लग रहा था जैसे सीमा फ़िल्म के गाने की छोटी सी गुड़िया वो खुद ही है | और लंबी सी कहानी स्वयम उसकी है।ब्राह्म मुहूर्त में स्नान करके खुले बालों सहित सितार बजाते हुए लग रहा था जैसे मीरा ही अपने साक्षात स्वरूप में पृथ्वी पर उतर आई हो।गाना खत्म होते ही सितार रखते हुए उसने देखा कि तपन पापा निर्निमेष नेत्रो से उसे निहार रहे थे


निगाह मिलते ही पापा के ओंठो से निकला “मनु बिटिया”, बिल्कुल ऐसे ही तो वो भी सुबह सुबह भैरवी राग बजा कर मुझे जगाती थी भगवान ने मेरी मनु को ही मेरे पास वापस भेज दिया है आज से मैं तुझे मनु कह कर ही पुकारूंगा।तुझे कोई एतराज तो नहीं है”,मैंने जवाब दिया ” कैसी बात करते हैं पापा मैं तो आपकी बिटिया हूं चाहे किसी नाम से पुकारिये ,मेरा भी तो दूसरा जन्म हुआ है इस जनम की जिंदगी आपने ही दी है आप मेरे पापा हो में आपकी मनु बस आगे कुछ मत कहना वरना मैं नही बोलती आपसे मुझे रूठना भी आता है”।पापा ने अपना वही चिर परिचित जोरदार अट्टहास लगाते हुए कहा ” बिल्कुल मनु ही सी है वैसी ही बांते भी करती है,अच्छा चल मैनें ही हारी मानी,खुश “।


और बस वो दिन है और आज का दिन तबसे , झगड़ू काका,बच्चू चाचा,बासंती चाची और घर मे आने जाने वाले सभी लोग पापा की महफिलों में आने वाले उनके मित्र वगैरह सब मुझे मनु ही कहने लगे है। कभी कभी तो मुझे भी भरम होने लगा है कि मैं और मनु कहीं जुड़वा बहने तो नहीं।पिछला जीवन उसके दुख पीड़ा आदि जैसे एक दुःस्वप्न था जो गुज़र चुका है।
कभी कभी उन दुःखो की याद अगर आती भी है तो एक धुंधली सी छाया सी आकर विलुप्त हो जाती है।पापा का उन्मुक्त ठठाका, पुराना खिलन्दड़ व्यक्तित्व अपने समूचे अस्तित्व के साथ जीवंत हो गया था। रातों की महफिलों की पुरानी रौनक लौट आई थी।वही दावतें वही चहलपहल जैसे हवेली के भी जवानी के दिन लौट आये थे।
शेष अगली 28 वी किश्त में
अनिल मिश्र एडवोकेट 9455065444

Share
LATEST NEWS