खुला खेल भाग 22-लेखक अनिल मिश्र एडवोकेट

स्व० चंद्र शेखर आज़ाद,स्व० रामनरायन आज़ाद,स्व०भगत सिंह ,स्व०शचीन्द्र नाथ,स्व०मणीन्द्र जी आदि शहीदों की चर्चा करते हुए मष्तिष्क में कुछ यक्ष प्रश्नों ने जन्म लिया जो अनुत्तरित हैं जिनके उत्तर हमें आपको ही खोजने है हमारे समाज को ही ढूंढने हैं, वो जांबाज रण बाँकुरे जो देश भक्ति के जज्बे में अपने बच्चों,बूढ़े मां बाप अपनी पत्नी,बहन भाई अपने पूरे परिवार को भूल कर शहीद हो गए,हंसते हँसते फांसी के फंदे पर झूल गए,अपनी जान की भी परवाह नहीं की सारा जीवन न्योछावर कर दिया आज हम लोग भारत देश के नागरिक जो अपने को देशभक्त कहते व महसूस करते फूले नहीं समाते है,क्या अपने कर्तव्य का पालन कर रहे हैं,क्या हमने कभी सोचा कि परिवार के मुखिया के न रहने पर परिवार के सदस्यों को किन यंत्रणाओं को भोगना पड़ा होगा |

किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा होगा।कितनी जिंदगियों की स्वतः कुर्बानी हो गई होगी एक शहीद की कुर्बानी के साथ। और जिस देश के लिए कोई शहीद हुआ देश को आज़ाद कराने के लिए उसी देश के आज़ाद होने के बाद हम आजाद भारत के नागरिकों ने शहीदों के परिवार के लिए कभी कुछ क्षण भी दिए उनके दुख दर्द में शरीक होने के लिए और ऐसे लोग तो अनगिनत हैं हज़ारो लोग तो वो शहीद हुए हैं जो गुमनाम रहे।

और छोड़िये मदद करने की सोच दूर,क्या कभी उनके वंशजो के लिए हमारे मन में कभी भी दिल के किसी कोने में उनके त्याग,तपस्या के लिए सम्मान या आदर की क्षणिक भावना की हल्की सी किरण भी कौंधी होगी,क्या हम उस त्याग कुर्बानी और जज्बे को भुला नहीं बैठे है जिनकी वजह से हम आजाद हुए है जिन्होंने अपना और अपने परिवार का सुख चैन भविष्य स्वयम कुर्बान कर दिया ,क्या हुआ शहीदों की उस अंतिम इच्छा का हश्र उस विश्वास का हश्र, उस भरोसे का हश्र जो वो जाते जाते व्यक्त कर गए थे।
“कर चले हम फिदा जांनो तन साथियों,अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों”।


शायद यह पंक्तियां गुनगुनाते हुए उन्होंने भी कल्पना नही की होगी कि उनके आज़ाद भारत के हम सब उनके कथित साथी इतने भोले,नादान साथी साबित होंगे कि उनकी भावना तो दूर उनके छोड़े हुए परिवार के उनके अंश,उनके वंशजों को जिनकी शिराओं में उनका ही रक्त दौड़ रहा है को भी अपनी भावना में स्वयम उपेक्षित कर देंगे।हर साल शहीद मेलों का आयोजन होता है।पुण्य तिथियां मनाई जाती हैं,सैकड़ो हज़ारो की भीड़ इकट्ठी होती है अमर रहें के नारों से दिशाएं गूंज जाती हैं,चित्रों पर फूल मालाएं चढ़ाई जाती है,भव्य आयोजन होते हैं,माननीयों के भाषण होते है उनके जीवन चरित्र पर जिनके सिद्धांतो पर चलने की हिदायत दी जाती है,संकल्प लिए जाते है

और बस फिर वही “ढाक के तीन पात” हम साल भर के लिए या अगले आयोजन तक उन्हें भूल जाते हैं।फर्रुखाबाद के राष्ट्रीय स्तर के कवि आदरणीय शिव ओम पांडेय “अम्बर”जी की यह पंक्तियाँ आज के माहौल में सार्थक प्रतीत होती हैं।”सत्य, अहिंसा,शांति ,प्रेम का बस हमसे इतना नाता है दीवारों पर लिख देते है, दीवाली तक पुत जाता है”।
क्रमशः-(आगे स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी,सरहद पर शहीद होने वाले एवम पुलिस वर्दी में शहीद होने वालों से संबंधित ज्वलन्त प्रश्न)

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