खुला खेल फर्रुखाबादी भाग 23 लेखक अनिल मिश्र एडवोकेट फर्रुखाबाद उ०प्र०


शहादत शहादत होती है,किसी भी अन्याय के खिलाफ अपने कर्तव्य के लिए,फ़र्ज़ के लिए,समाज के लिए,राष्ट्र के लिए,इंसानियत के लिए,अपनी जान की कुर्बानी देने का नाम ही शहादत है जिसकी कोई कीमत नहीं लगाई जा सकती जिसे दुनिया की किसी भी बहुमूल्य से बहुमूल्य वस्तु से भी तराजू पर तौला नहीं जा सकता है।चाहे वो पुलिस की खाकी वर्दी में अपने फ़र्ज़ का निबाह करते हुए,या सीमा पर देश की हिफाज़त करते हुए दी गई शहादत हो, उसकी उस ज़ज्बे की न तो भरपाई ही कि जा सकती है न ही उसका कोई मोल ही लगाया जा सकता है,हाँ अश्रुपूरित नयनों से एक संवेदनशील रिश्ता उस महान हुतात्मा से जोड़ते हुए उसे सच्ची श्रद्धांजलि दी जा सकती है।लेकिन क्या यहीं तक हमारा कर्तव्यबोध जाग्रत रहेगा,उस शहीद को जो अपने कर्तव्य की बलिवेदी पर खुद को न्योछावर कर गया हो ,अपने पीछे अपने परिवारीजनों को अनाथ छोड़ गया हो जो उसके अपने थे अपना खून थे कहीं अपने पिता के वापस आने की राह जोटता मासूम बचपन होगा,कहीं सिसकी लेता मेहंदी महावर,तो कहीं मां का सूना आँचल कलेजे से उठती ममता की हूक, एक बार बस एक बार उस सुदृढ़ कलाई पर राखी बांध पाने को खोजती बहन की सूनी सूनी आंखे,तो कहीं इस ह्रदय विदारक दुःख के भार से और झुक चुकी एक पिता की टूटी कमर,जर्जर नीरव बुढापा,पता नही वो शहादत केवल एक शहीद की थी या कई टूट चुकी जिन्दगियों की।यह सब देख कर भी क्या हम इतने निर्दयी हैं कि हमें उस परिवार के आंसू,पीड़ा,दर्द ,घुटन,बेबसी परेशानियों,में हिस्सा बटाने के अपने उत्तरदायित्व का एहसास नहीं होता है।


संविधान की शपथ लेकर पुलिस की वर्दी पहनने वाले भारत के “बावर्दी नागरिक” को भी कर्तव्यपरायणता के वशीभूत जान न्योछावर करने के बाद समाज की इसी सोच का सामना करना पड़ता हैI बल्कि सच कहें तो पुलिस की नौकरी के दौरान भी पता नहीं क्या कुछ नही भोगना पड़ता है अपने पदीय कर्तव्य के निर्वहन के दौरान किन किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है यह अगर वर्दी के पीछे धड़कते दिल में झाँकने की कोशिश की जाए तो सही तस्वीर सामने आती है।लेकिन समाज में इस विभाग के बारे में सोच ऐसी बन चुकी है कि उससे उलट कुछ सोचना या कहना कई आलोचनाओं चर्चाओं को जन्म देने लगता है यह भी सच है कि सच को सच और गलत को गलत कहने का साहस जिस समाज में होता है वहाँ पर बुराइयां नकारात्मक सोच ज़ुल्म ज़्यादती पनप नही पाते हैं। खाकी वर्दी के पीछे किसी पुलिस वाले को किन किन दिक्कतों, कठिनाइयों,बाधाओं,परेशानियों व पीड़ा का सामना करना पड़ता है इसकी ओर भी हमारा ध्यान नही जाता है बल्कि हमें इनसे अपेक्षाएं तवक्को काफी रहती हैं।

क्या यह सच नही है कि जाडा हो गर्मी ,आंधी हो तूफान,लूलपट चलती हो या अंधड़ बला की कड़कड़ाती ठंड हो जिसमें खुद के पैर की एक उंगली तक रज़ाई के बाहर निकालने का साहस न होता हो पुलिस वाले से यही अपेक्षा होती है कि अहर्निशं सेवायाम की भावना के साथ अपनी ड्यूटी निबाहेगा और डयूटी भी कहाँ कहाँ पुलिस के बगैर समाज की कल्पना नही,शादी हो ब्याह हो ,आंदोलन हो या मांगो को लेकर कोई प्रदर्शन जाम हो या वी.आई.पी.ड्यूटी, अपराध हो या ज्यादती दैवीय आपदा हो चुनाव हर जगह पुलिस की जरूरत और उससे अपेक्षायें हद तो यह कि अगर पुलिस द्वारा कोई अच्छा काम भी किया जाता कोई अच्छा पुलिस अधिकारी आ जाता जो कोई अच्छा काम भी करता तो उसकी तारीफ करने का साहस इसलिए नहीं होता कि पुलिस के आदमी न बोले जाए मुखबिर या दलाल की संज्ञा से न विभूषित कर दिए जाएं आश्चर्य होता है कि किस जर्जर सोच की लक्ष्मण रेखा में हमने स्वयं खुद को कैद कर रखा है।यह भी सच है कि हम भी कभी खाकी वर्दी के पीछे धड़कते दिल में झाँकने का प्रयास नही करते एक संवादहीनता की स्थिति बना रखी है.।

अंग्रेजी के कवि P.B.Shelly ने एक कविता लिखी थी “skylark” जिसकी काफी मशहूर पंक्तिया हैं “our sweetest songs are those that tell of saddest thought” अर्थात मेरे मधुरतम गीत वो हैं जो मेरे ह्रदय की गहनतम पीड़ा को व्यक्त करते हैं लगता है यह पंक्तियां किसी पुलिसकर्मी के नौकरी शुरू करने से लेकर उसके रिटायरमेंट तक साये की तरह ही उसके साथ रहती हैं अपने कर्तव्य पालन के दौरान ज्यादातर समय परिवार से दूर रहते हुए भी समस्त पारिवारिक उत्तरदायित्यों का निर्वाह करना और कभी कभी तो किसी परिवारीजन (माँ, पिता,भाई, बहन,पत्नी आदि)के गम्भीर बीमार होने पर भी विभागीय कारणों से छुट्टी न मिल पाने से तत्काल न पहुँच पाने की लाचारी के दर्द को वही समझ सकता है जिसने उन क्षणों को भोगा हो,इनका न सुख अपना होता है न दुख । घर में शादी ब्याह बारात तिलक तक में वांछित समय की छुट्टी न मिल पाना यहां तक कि कभी कभी तो परिस्थितिवश स्वयं के विवाह के अवसर पर भी ग्यारहवें घण्टे पहुंच पाने के अपवाद स्वरूप का सामना करना भी इन्ही के हिस्से में आता है।

ईद बकरीद होली दीवाली जन्माष्टमी आदि बहुत से तीज त्योहार खुद न मना कर ड्यूटी पर मुस्तैद रहना भी इन्ही की नियति है होली के दूसरे दिन मनाई जाने वाली पुलिस विभाग की होली तो जग जाहिर है ही।हमने आपने कई जगह विशेषकर थानों कोतवाली में एक स्लोगन लिखा देखा है”प्रत्येक पुलिसमैन बावर्दी नागरिक है ओर प्रत्येक नागरिक बिना वर्दी पुलिसमैन”,यह सही भी है कानून का मुकम्मल पालन भी तभी हो सकता है लेकिन कितनी विडम्बना की बात है हम इस स्लोगन के अर्धांश को तो स्वीकार,अंगीकार करते है बाकी के अर्धांश को अपनी सुविधानुसार नकार देते हैं।हम प्रत्येक पुलिसजन से इसकी तो पूर्णरूपेण अपेक्षा करते हैं कि वो बावर्दी नागरिक है किंतु अपने बिना वर्दी पुलिसजन होने को स्वीकार नही करते क्योंकि उसमें कानून मानने वाले नागरिक की परिकल्पना है।

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