“प्रेस के मित्रों का जीवन –बाधाएं एवम कठिनाइयां–एक विहंगावलोकन”

प्रिय मित्रों /पाठक गण वैसे तो “खुला खेल फर्रुखाबादी” की अगली किश्त का आपको इंतज़ार होगा,विगत समय में जिस प्यार स्नेह से आपने “सैलानी” के किरदार को चाहा, अपनाया उसके लिए आभार ही नही वरन कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ।इसी बीच कोरोना की दूसरी लहर ने अपने भयावहतम स्वरूप में पुनः सम्पूर्ण मानवता को झकझोर कर रख दिया है।ऐसी परिस्थिति में कलम ,चाहे वो लेखक की,कवि की,साहित्यकार की,वैज्ञानिक की,डॉक्टर की,प्रेस की,दार्शनिक की या किसी भी शक्ल में हो, का केवल केवल एक ही धर्म होता है कि वो समाज विरोधी,राष्ट्र विरोधी,इंसानियत विरोधी शक्तियों की विचारधारा को समूल नष्ट करने के अभियान में अपने सत्यम शिवम सुंदरम के कर्तव्य का पालन करे।


“कलम सत्य की धर्म पीठ है, शिवं सुन्दरम गाती है,
राजा भी अपराधी हो तो फिर सीना ठोंक बताती है”।
कोरोना संकट के दौरान समाज के जिन तबको ने आगे आकर अपने प्राणों की परवाह किये बगैर
कोरोना वारियर के रूप में कार्य किया उनमे से एक प्रेस के मित्रों की आज कुछ बात हो जाये। विगत 3 मई को “विश्व प्रेस स्वतन्त्रता दिवस” पूरे विश्व में मनाया गया । हर साल इसी तारीख को मनाया जाता है।हर साल एक नई थीम एक नए विषय पर आधारित होता है,इस साल का विषय भी है”सूचना से जन कल्याण”। यह दिन आता है चला जाता है कुछ आयोजन भी होते है,सम्मान समारोह भी होते हैं जोशो खरोश के साथ ।प्रेस के मित्रो के अतिरिक्त हम सरकार के एवम स्वयम के उत्तरदायित्वों कर्तव्य एवम अधिकारों की चर्चा भी करते है लेकिन फिर भी कुछ यक्ष प्रश्न यथार्थ के धरातल पर अनुत्तरित ही रह जाते हैं। क्या कभी आम जन मानस ने इनसे अपनी अपेक्षाओं,उम्मीदों,अधिकारों की लक्ष्मण रेखा के पार जाकर भी पत्रकार बन्धुओं के दिल में झांकने की कोशिश की है। जो कलम निरन्तर दूसरों के व्यापक संदर्भों में चल रही हो जिससे हजारों अपेक्षाएं हो वो स्वयम के संदर्भ में कैसे चल सकेगी।उसके चलने की राह में दिन प्रतिदिन क्या क्या दिक्कते आती होंगी,


वो भी समाज का ही एक अंग है समाज की नकारात्मक या सकारात्मक सोच का उसके व्यक्तिगत जीवन में सामाजिक,आर्थिक,वैयक्तिक आदि विभिन्न पहलुओं पर क्या क्या दुष्प्रभाव पड़ते है और हम भारत के नागरिक जो भारत के संविधान में आस्था रखने वाले लोग हैं किस हद तक अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करते या नहीं करते है यह सबसे ज्वलन्त प्रश्न है।उसकी कलम के निरन्तर सुचारू रूप से चलने में हमे सत्य की जितनी अपेक्षा है उसकी राह कितनी दुष्कर है क्या कभी इस ओर भी हमारा ख्याल जाता है। उस कलम को प्रभावित करने हेतु प्रलोभन से लेकर,साम दाम दण्ड भेद के हथियारों से सुसज्जित कितने निहित स्वार्थी तत्व हर क्षण किन किन कुत्सित योजनाओं के चक्रव्यूह की संरचना में संलग्न रहते हैं क्या कभी हमारी निगाह उधर जाती भी है तो क्या हम मूक दर्शक नही रहते। बस हम तो हमेशा कलम के इसी मूल धर्म को गुनगुनाते रहते हैं जो डॉ० शिव ओम अम्बर की निम्न पंक्तियों में परिभाषित होता है


“या बदचलन हवाओं का रुख मोड़ देंगे हम,या खुद को वाणीपुत्र(कलमकार)कहना छोड़ देंगे हम/जिस दिन भी हिचकिचाएंगे लिखने में हकीकत,कागज को फाड़ देंगे कलम तोड़ देंगे हम”।
हांलाकि पंजाब केसरी के संवाददाता साथी दीपक सिंह ने प्रेस स्वतन्त्रता दिवस पर पत्रकारों के दिल का दर्द बयां करने का एक प्रयास सोशल मीडिया पर किया भी है लेकिन आगे हम विस्तार से इसके विभिन्न पहलुओं पर चर्चा करेंगे। (क्रमशः) लेखक अनिल मिश्र एडवोकेट फर्रुखाबाद उ०प्र —- 9455065444

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