गुरु द्रोणाचार्य ने करायी थी स्थापना भक्तों की होती हैं हर मुरादें पूरी-देखे वीडियो

शारदीय नवरात्र रविवार से शुरू हो चुके हैं। शहर का माहौल पूर्ण रूप से आध्यात्मिक हो चुका है। आज हम ऐतिहासिक मन्दिर गुरुगांव देवी (गुरु ग्रामेश्वरी) की चर्चा कर रहे हैं।
फर्रुखाबाद के अंतिम छोर पर बीबीगंज स्थित गुरु ग्रामेश्वरी देवी का मंदिर अपनी पौराणिक मान्यताआें के कारण श्रृद्धा का केंद्र बना हुआ है। भक्तगण इसे मंगला देवी के नाम से भी जानते है। यह मंदिर गुरुगांव में स्थित है। नगर के पश्चिमी छोर पर आज जो गांव नेकपुर क नाम से बसा हुआ है ,यहां पर गुरु द्रोणाचार्य जी निवास करते थे इसीलिये इसे गुरुगांव कहा जाता है। शारदीय नवरात्र में गुरुगांव देवी मंदिर आस्था का केंद्र बना हुआ है। भोर से देर रात तक भक्तों का रैला मंदिर में जमा रहता है। मां की कृपा से लोगों की मुरादें पूरी होती हैं।

कहा जाता है कि कम्पिल में राजा द्रुपद का राज्य था। उनके किले के अवशेष व प्राचीन वस्तुएं आज भी जिजौटा क्षेत्र में मिलती रहती है जो कि कम्पिल से लगभग 7 किलोमीटर दूर है । राजा द्रुपद तथा गुरु द्रोणाचार्य आपस में अभिन्न मित्र थे। उस समय कम्पिल ही पांचाल देश की राजधानी थी। गुरु द्रोणाचार्य जी अपने नित्य कर्म को यहीं सम्पन्न करते थे। वह प्रतिदिन गंगा स्नान को जाते थे। एक दिन रास्ते में आवाज सुनायी दी’ मैं दबी पडी$ हूं मुझे बाहर निकालो।Ó उन्होंने आवाज की आेर ध्यान केंद्रित कर देखा तो एक स्थान पर एक कन्या आधी जमीन के अंदर तथा आधी जमीन के ऊपर दिखायी दी। गुुरु जी उस कन्या के पास गये और उसे प्रणाम करके उठा लिया और उसे भी गंगा स्नान के लिये ले गये। उन्होंने स्वयं स्नान करने के साथ कन्या को भी स्नान करवाया। स्नान करने के पश्चात उस कन्या ने कहा कि मुझे उसी स्थान पर ले चलो जहां से लाये हो। इतना कहने के बाद कन्या एक मूर्ति में बदल गयी। गुरु द्रोणाचार्य जी बडे$़ गदगद भाव से उस मूर्तिरूपी कन्या को उसी स्थान पर ले आये जहां से उसे प्राप्त किया था। और उसकी स्थापना की योजना बनायी। उन्होंने फर्रुखाबाद के बीचों बीच स्थित श्री पांडव बाग में अज्ञातवास में रह रहे पांडव जनों से सम्पर्क कर स्थापना का कार्यक्रम सम्पन्न कराया।


पुराणों में यह कथा भी वर्णित है कि गौरा जी अपने पिता राजा दक्ष का यहां यज्ञ में बिना आमंत्रण के पहुंच गयी और वहां अपने पति भगवान शिव के अपमान से क्षुब्ध होकर उन्होंने यज्ञ में कूद कर अपने प्राण त्याग दिये। गणों द्वारा सूचना मिलने पर भगवान शिव यज्ञ स्थल पर गये और क्रोधित होकर गौरा जी के मृत शरीर को कंधे पर रख कर तांडव करने लगे। भगवान शिव के तांडव नृत्य से पृथ्वी डगमगाने लगी। इससे समस्त देवता घवरा गये और शिव जी को शांत करने का प्रयास करने लगे। सभी देवताआें ने भगवान विष्णु से शिव का कोप शांत करने की विनती की। इस पर भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र को आदेशित किया कि यह गौरा जी के शरीर को भगवान शिव से दूर करे। आवेश पाते सुदर्शन चक्र ने अपना कार्य प्रारम्भ किया। जिसके फल स्वरूप मृत शरीर के तमाम टुकडे$ पृथ्वी पर बिखर गये। यह टुकडे$ जहां-जहां गिरे वह महा शक्ति पीठ के रूप में प्रसिद्ध हुये। एक टुकडा$ जो कि उनकी मांग का हिस्सा कहा जाता है, गुरुगांव में गिरा वही स्थान कालांतर में माता मंगला देवी के नाम से विख्यात हुआ। गुरुद्रोणाचार्य जी को भी जो कन्या मिली थी उसने भी यही कहा था कि मैं गौरा जी के मांग का एक हिस्सा हूं और मुझे मंगला देवी के नाम से जाना जाये। उस देवी स्वरूप कन्या ने कहा था कि जो भक्त मेरी पूजा अर्चना करेगा उसका मैं सदैव कल्याण करूंगी।


ब्रह्मलीन प्रमुख संत कारव वाले बाबा का यहां जब तब आगमन होता रहता था। उन्होंने भी यह कहा था कि यह स्थान महा शक्तिपीठ है यहां के एक भक्त अशोक रस्तोगी ने स्वयं तथा अन्य भक्तों से सहयोग प्राप्त कर श्री गुरु धाम की स्थापना की। इसमें नि:शुल्क औषधालय भी चल रहा है तथा एक धार्मिक पुस्तकालय भी खुल गया है। इसी गुरु धाम में कन्याआें की विवाह आदि की व्यवस्था भी नि:शुल्क होती है। वर्तमान समय में प्रत्येक मंगलवार को गुरुगांव देवी मंदिर में सैकड़ों श्रृद्धालुजन पूजा अर्चना करते हैं। नवदुर्गा पर मंदिर के चारों आेर धूम मची हुई है। इन दिनों मे लाखों श्रृद्धालु मां के दर्शन के लिए वहुत दूर-दूर से आते हैं तथा मनौतियां पूर्ण होने पर प्रसाद वितरण करते है तथा भंडारे का आयोजन भी करते है। एक समय था जब इस स्थान पर लोग जाने से कतराते थे क्योंकि यह स्थान काफी एकांत व भयाभय लगता था लेकिन मां की कृपा से आज यहां दिन रात भक्तों की भीड़ लगी रहती है।

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